नमस्कार दोस्तों,
ओम नमः शिवाय।
हमारी दुनिया‘ में आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है।
सप्ताह की शुरुआत हम हमेशा अपने बुजुर्गों के आशीर्वाद से करते हैं। आज मैं आपको अपने एक ऐसे ही मार्गदर्शक, अपने दादाजी ठाकुर गुलाब सिंह तोमर जी की कहानी बताने जा रही हूँ। जैसा कि मैंने पहले भी आप लोगों से साझा किया है, हम भाई-बहनों ने अपने दादाजी को कभी सामने से नहीं देखा, सिर्फ तस्वीरों में ही निहारा है। हम उनके सीधे प्यार और अपनेपन को महसूस नहीं कर पाए, क्योंकि हमारे मम्मी-पापा की शादी से पहले ही वह इस दुनिया से विदा हो चुके थे। यहाँ तक कि हमारी मम्मी ने भी उन्हें कभी नहीं देखा था।
लेकिन आज मैं आपको अपने पापाजी, बुआजी, ताऊजी और दादीजी से सुने हुए दादाजी के उन किस्सों के बारे में बताने जा रही हूँ, जिन्हें सुनकर महसूस होता है कि हमारे दादू सच में ‘वर्ल्ड बेस्ट दादू’ थे।
संघर्ष और स्वाभिमान का शुरुआती दौर।
दादाजी दो भाई थे। उनके बड़े भाई उस ज़माने के रईस, थोड़े बिगड़े हुए और घमंडी स्वभाव के व्यक्ति थे, जो कोई काम नहीं करते थे। दादाजी छोटे थे, लेकिन बेहद ज़िम्मेदार थे। वह खेतों में नौकरों के साथ मिलकर खुद सारा काम संभालते थे और साथ ही अपनी पढ़ाई भी करते थे। साल 1931 में दादाजी ने मिडिल स्कूल पास किया था। उन्हें उर्दू भाषा का भी बहुत अच्छा ज्ञान था, जो उस दौर में एक बहुत बड़ी बात मानी जाती थी।
समय बदला और दादाजी की शादी हमारी दादीजी श्रीमती विद्या देवी जी से हुई। दादाजी अपनी इस छोटी सी दुनिया में बहुत खुश थे। गाँव में उनका बहुत सम्मान था और लोग उन्हें आदर से ‘मास्टरजी’ कहकर पुकारते थे। हमारी दादीजी भी उस दौर में पढ़ी-लिखी थीं।
मुश्किलों का दौर और परिवार का साथ।
सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन एक बड़ा दुःख इस परिवार पर मंडरा रहा था। दादा-दादी के बच्चे जनम लेते ही शांत (मृत्यु) हो जाते थे। इस वजह से पूरा परिवार गहरे दुःख में था। दादी का मायका बहुत बड़ा था औरवह अपने भाइयों, ताऊ और चाचा के इतने बड़े भरे-पूरे परिवार में अकेली बहन थीं, इसलिए सब की बेहद लाडली थीं। जब दादी दोबारा गर्भवती हुईं, तो किसी सयाने की सलाह पर दादाजी ने उन्हें उनके मायके भेज दिया…”वहीं पर हमारे ताऊजी का जन्म हुआ।
इसके बाद परिवार की खुशियाँ लौट आईं। बाकी बच्चों का जन्म भी दादी के मायके में हुआ, बस हमारे पापा का जन्म यहीं (गाँव में) हुआ था।धीरे-धीरे बच्चे बड़े होने लगे और दादा-दादी उम्र के अगले पड़ाव पर पहुँच गए। उन्होंने अपने सभी बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर पूरा ध्यान दिया। उस दौर में बुआजी स्कूल नहीं जा सकीं, क्योंकि स्कूल दूसरे गाँव में था और वहाँ जाना मुमकिन नहीं था। इसके बावजूद, दादाजी ने बुआजी को घर पर ही सिलाई, कढ़ाई, बुनाई और गृहस्थी के सारे काम सिखाने में पूरा सहयोग दिया।
7 साल का कानूनी संघर्ष और अंतिम परीक्षा।
सारे ताऊजी की शादी हो चुकी थी और बुआजी की भीं ओर उनके बच्चे भी हो गए थे बड़े ताऊजी के बच्चे तो शादी के लायक भी हो गए थे दादाजी के जीवन में भी खुशियों के पल आने वाले थे, तभी दादाजी के बड़े भाई के बच्चों ने ज़मीन-जायदाद का एक झूठा केस दर्ज कर दिया। बस फिर क्या था, परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। दूसरे नंबर के ताऊजी रोज़ कोर्ट-कचहरी के चक्कर में गाज़ियाबाद आने-जाने लगे। उस समय आने-जाने के साधन नहीं होते थे, इसलिए कई बार पैदल ही लंबा रास्ता तय करना पड़ता था। दादाजी भी उनके साथ जाते थे।
यह कानूनी लड़ाई 6-7 साल तक चलती रही। आखिरकार सच की जीत हुई और दादाजी केस जीत गए। लेकिन उन 6-7 सालों ने परिवार को आर्थिक और मानसिक रूप से बहुत थका दिया था। इन सबके बावजूद दादाजी ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने दिन-रात कड़ी मेहनत की ताकि अपने परिवार को एक सम्मानजनक और अच्छी ज़िंदगी दे सकें।
अधूरी रह गई एक हसरत।
इतनी मेहनत और संघर्ष करते-करते दादाजी का शरीर अंदर से टूट चुका था। अब जीवन की आखिरी ज़िम्मेदारी बाकी थी—मम्मी और पापा की शादी। शादी की तारीख तय हो चुकी थी, लेकिन तभी अचानक दादाजी की तबीयत बिगड़ी। डॉक्टरों ने बताया कि उन्हें ‘ब्लड कैंसर’ है और वह भी आखिरी स्टेज पर। उस दौर में चिकित्सा की इतनी सुविधाएँ नहीं थीं कि बीमारी का पहले पता चल पाता।
और आखिरकार, मम्मी-पापा की शादी से कुछ समय पहले ही वह इस दुनिया को छोड़कर चले गए। हमने अपने दादू को पाने से पहले ही खो दिया। हम उनके सीधे प्यार और साये से वंचित रह गए, लेकिन वो आज भी हमारे संस्कारों और यादों में हमेशा जिंदा हैं।
मेरी आप सभी से एक छोटी सी गुज़ारिश।
दोस्तों, आज मैंने आपको अपने दादाजी के बारे में बताया कि वह कितने महान और स्वाभिमानी इंसान थे। उन्हीं के दिए हुए अच्छे संस्कारों की वजह से आज हमें इतने प्यारे पापा मिले हैं।
अगर आज आपके पास आपके दादा-दादी या नाना-नानी मौजूद हैं, तो कृपया उनके पास बैठिए। उनसे बातें कीजिए, उनके जीवन के अनुभवों को सुनिए। क्योंकि जो सीख और तजुर्बा हमारे बुजुर्ग दे सकते हैं, वह दुनिया की कोई किताब या गूगल का कोई सर्च इंजन नहीं दे सकता।
अक्सर हम सोचते हैं कि “अभी काम बहुत है, जब फुर्सत मिलेगी तो बात कर लेंगे।” लेकिन हमेशा याद रखिएगा—बुजुर्गों के पास अब ज़्यादा वक़्त नहीं बचा है। पता नहीं किस पल, किस मोड़ पर वो सब कुछ छोड़ कर चले जाएँ और आपको संभालने का मौका भी न मिले। अपने बुजुर्गों को सम्मान दें, उन्हें समय दें।
आपको मेरे दादाजी की यह कहानी कैसी लगी, कमेंट करके ज़रूर बताइएगा। पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूलें।

We always miss uhhh both 🌺🌺
Thanks 👍
Heart touching story
Yes