मम्मी-पापा की जीवन यात्रा (भाग-7): बंटवारे का वो दर्द और खाली हाथ शुरुआत की कहानी

ॐ सूर्याय नमः

‘हमारी दुनिया’ के प्यारे पाठकों, आप सभी का ‘मम्मी-पापा की जीवन यात्रा’ के सातवें भाग में बहुत-बहुत स्वागत है। पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे मम्मी और पापा का विवाह संपन्न हुआ और वे एक नए बंधन में बंधे। आज हम आपको बताएंगे कि विवाह के बाद उनके जीवन का असली और कठिन संघर्ष कैसे शुरू हुआ।

संयुक्त परिवार की जिम्मेदारियां और गांव का जीवन

पापा का परिवार एक बहुत बड़ा संयुक्त परिवार (Joint Family) था। घर में करीब 15 से 20 सदस्य थे। मम्मी बचपन से कस्बे (शहर) के माहौल में पली-बढ़ी थीं, जबकि पापा का घर ठेठ गांव में था। शादी के बाद मम्मी के लिए यह बदलाव बिल्कुल नया और चुनौतीपूर्ण था।

इतने बड़े परिवार में काम का सारा बोझ मम्मी के कंधों पर आ गया। उस दौर में आज की तरह आधुनिक साधन नहीं थे। मिट्टी के चूल्हे पर दिन में तीन बार इतने सारे लोगों के लिए खाना बनाना कोई आसान काम नहीं था। सुबह का काम खत्म नहीं होता था कि दोपहर के खाने का वक्त हो जाता था। इसके अलावा, गांव के घरों में मेहमानों और मिलने-जुलने वालों का आना-जाना लगा रहता था। कोई भी आए, उनके लिए चाय-नाश्ता और सेवा-सत्कार में मम्मी हमेशा आगे रहती थीं। शुरुआत के दिन मम्मी के लिए बेहद मुश्किल भरे रहे, लेकिन उन्होंने कभी चेहरे पर शिकन नहीं आने दी और कभी हार नहीं मानी।

जब अपनों ने ही मोड़ लिया मुंह: घर का बंटवारा

पापा अपनी नौकरी (Job) में व्यस्त रहते थे ताकि परिवार को आर्थिक सहारा मिल सके। लेकिन इसी बीच परिवार में एक ऐसा मोड़ आया, जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। घर में बंटवारे की बात शुरू हो गई।

चूंकि मम्मी और पापा घर में सबसे छोटे थे, इसलिए किसी ने उनकी राय लेना भी जरूरी नहीं समझा। बड़ों ने आपस में मिलकर सब कुछ तय कर लिया। बंटवारा इस कदर बेरहमी से हुआ कि सबने अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से चीजें बांट लीं, यहाँ तक कि मम्मी-पापा के हक का सामान भी दूसरों के पास चला गया। उनके हिस्से में आई तो सिर्फ वो जमीन, लेकिन रहने और गुजर-बसर करने के लिए कोई साधन नहीं बचा।

खाली हाथ और चार जिंदगियों का सफर

आप जरा आंखें बंद करके उस स्थिति की कल्पना कीजिए… एक ऐसा घर जिसमें खाना बनाने के लिए एक बर्तन तक न छोड़ा गया हो, न राशन का एक दाना हो।

साधनों के नाम पर सब कुछ शून्य था, लेकिन जिम्मेदारियां पहाड़ जैसी थीं। एक तरफ एक छोटी सी बेटी (हमारी दीदी) थी, और दूसरी तरफ बुजुर्ग दादी जी थीं, जो हमारे मम्मी-पापा के हिस्से में ही आईं।

अब ज़रा सोच कर देखिए, उस मुश्किल दौर में इतने कम साधनों के साथ मम्मी-पापा ने कैसे सरवाइव (Survive) किया होगा? कैसे उन चार लोगों का गुजारा हुआ होगा, जहां एक तरफ बूढ़ी दादी की देखभाल थी और दूसरी तरफ एक छोटी सी बच्ची की जरूरतें?


आगे क्या हुआ?

इस खाली हाथ और खाली घर से मम्मी-पापा ने अपने जीवन की नई इमारत कैसे खड़ी की? कैसे उन्होंने इस घोर अंधकार में उम्मीद का दीया जलाया? इस दिल को छू लेने वाले संघर्ष की आगे की दास्तान हम आपको बताएंगे अगले भाग में।

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आज का विचार: आपको क्या लगता है, ऐसी विपरीत परिस्थितियों में एक इंसान को सबसे ज्यादा ताकत किस चीज से मिलती है? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार हमारे साथ जरूर शेयर करें।

जल्द ही मिलते हैं अगले भाग के साथ, तब तक के लिए अपना और अपने परिवार का ख्याल रखें। धन्यवाद!


Family sitting around a clay stove inside a rustic home, cooking food
A rural family cooks together inside their simple clay-walled home during a rainy day.

4 thoughts on “मम्मी-पापा की जीवन यात्रा (भाग-7): बंटवारे का वो दर्द और खाली हाथ शुरुआत की कहानी”

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