नमस्कार दोस्तों, ओम नमः शिवाय!
आज ‘हमारी दुनिया’ में हम एक ऐसा सवाल लेकर आए हैं जो हर बेटी के दिल में कभी न कभी ज़रूर उठता है—आखिर बेटियों का अपना घर कौन सा होता है? वह घर जिसमें वे जन्म लेती हैं, खेल-कूदकर बड़ी होती हैं, या फिर वह घर जहाँ शादी के बाद वे जाती हैं? मुझे तो आज तक समझ ही नहीं आया कि कौन सा घर बेटियों का अपना घर होता है।जब तक मम्मी-पापा होते हैं, बेटियाँ मायके को ही अपना घर समझती हैं। लेकिन मम्मी-पापा के जाने के बाद, वह अहसास भी धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। दूसरी तरफ, जहाँ वे शादी करके जाती हैं, अपनी नई दुनिया बसाती हैं, अपनी सारी खुशियों को भूलकर, अपने फर्ज़ और ज़िम्मेदारियों को समझकर दिन-रात काम करती हैं और सबको खुश रखती हैं—वह ससुराल भी कभी पूरी तरह उनका हो ही नहीं पाता।फिर आप ही बताइए कि बेटियों का घर कौन सा होता है? इस पूरी सृष्टि और समाज को बनाने वाली बेटियों का अपना कोई घर ही नहीं है, ऐसा क्यों? बेटे और बेटियों में इतना फर्क क्यों किया जाता है? ससुराल में बहू को कभी भी बेटी जैसा प्यार नहीं मिलता, ऐसा क्यों? बेटी और बहू में इतना भेदभाव क्यों है?यह सवाल सिर्फ मेरा नहीं है, बल्कि कहीं न कहीं हर बेटी के मन की आवाज़ है कि इस दुनिया में बेटियों का अपना कोई पक्का घर नहीं होता। आप लोगों में से कितने लोग मेरी इस बात से सहमत हैं? या आप में से कितनों के मन में कभी न कभी यह सवाल आया है? मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएं।
जय श्री राम!
सुना है बेटियों का कोई घर नहीं होता, पर सच तो ये है कि बेटियों के बिना कोई घर मुकम्मल नहीं होता!
🫡
💯
Nice
Thanks 🙏