नमस्कार दोस्तों,’हमारी दुनिया’ के इस अंक में आज हम बात करेंगे कि बेटियों के जीवन में माता-पिता की क्या भूमिका होती है। माता-पिता हर बच्चे के रोल मॉडल होते हैं। वैसे तो सभी बच्चे उनसे बहुत कुछ सीखते हैं, लेकिन बेटियों के लिए वे किसी ‘रियल लाइफ हीरो’ से कम नहीं होते। माता-पिता जैसा व्यवहार आपस में और दूसरों के साथ करते हैं, बेटियाँ वही देखकर बड़ी होती हैं और वैसा ही सीखती हैं।सदियों से यही परंपरा चली आ रही है। लेकिन समझ नहीं आता कि जब वही बेटियाँ किसी घर की बहू बनती हैं, तो क्या बदल जाता है? वे ससुराल जाकर सास-ससुर को अपने माता-पिता का दर्जा क्यों नहीं दे पातीं? अगर कभी पति अपने माता-पिता से अलग होने की बात करे, तो पत्नी खुलकर यह क्यों नहीं कहती कि ‘ये सिर्फ आपके नहीं, मेरे भी मम्मी-पापा हैं और मैं इन्हें छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी’? वह अपने पति को यह क्यों नहीं समझाती कि बुजुर्ग माँ-बाप को अकेले छोड़ना सही नहीं है और हँसता-खेलता घर तोड़ना गलत है?ऐसे समय में बेटियाँ अपने मायके के संस्कार क्यों भूल जाती हैं? और बेटी के माता-पिता भी उसे यह क्यों नहीं समझाते कि ‘बेटा, यह सब ठीक नहीं है, वे भी किसी के माता-पिता हैं और उन्हें इस उम्र में दुख देना पाप है’। माता-पिता को चाहिए कि अपनी बेटियों को प्यार से समझाएँ और ज़रूरत पड़े तो थोड़ी सख्ती भी दिखाएँ। आज हमारे समाज में रिश्तों की अहमियत कम होती जा रही है, इसलिए हमें हर हाल में अपने परिवार और रिश्तों को बचाना होगा। बेटियों की शान ओर बेटियों की जान होते है मम्मी पापा अगर वो उनको ठीक से समझाएंगे तो वो जरूर समझेंगी ओर रिश्तों को कभी नहीं बिखरने देंगी।
बेटी तो उस दीपक की तरह है, जो मायके और ससुराल दोनों जगह रोशनी फैलाती है।
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True feelings
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