नमस्कार दोस्तों, ‘हमारी दुनिया’ (humariduniya.in) में आप सभी का बहुत-बहुत स्वागत है। ओम नमः शिवाय। ✨
आज सोमवार को ‘हमारे बुजुर्ग’ के तहत आज हम बात करेंगे परिवार के एक और मुख्य स्तंभ की—हमारे सास-ससुर।
आंकड़े बताते हैं कि आज के समय में लगभग 60% बहुओं के पास या तो सिर्फ सास होती हैं या सिर्फ ससुर। केवल 40% परिवार ही ऐसे हैं जहाँ दोनों सुरक्षित हैं। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जहाँ दोनों हैं भी, या तो वे बच्चों से अलग रहते हैं या फिर बच्चों ने उन्हें उनके हाल पर अकेला छोड़ दिया है।
क्या इसी दिन के लिए बेटों को पाला था?
मन में सवाल उठता है कि आख़िर ऐसा क्यों है? क्या इसी दिन के लिए माँ-बाप अपने बेटों को पाल-पोसकर बड़ा करते हैं? कितने अरमानों और सपनों के साथ घर में बहू को लाया जाता है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि हमेशा सारी बहुएँ ही गलत होती हैं। कुछ सास-ससुर भी ऐसे होते हैं जो बहुओं को खुले दिल से अपना नहीं पाते। वे कहने को तो बहू को ‘बेटी’ बोलते हैं, पर असल में उसे बेटी बना नहीं पाते।
लेकिन कमियाँ चाहे किसी में भी हों, सम्मान तो वो बुजुर्ग भी डिज़र्व (Deserve) करते हैं। अगर हमारे अपने सगे मम्मी-पापा हमारे साथ कभी कुछ गलत कर दें या गुस्सा कर दें, तो क्या हम उन्हें सम्मान देना छोड़ देते हैं? नहीं ना? क्योंकि हम जानते हैं कि वो हमारे माँ-बाप हैं। तो फिर सास-ससुर के साथ ऐसा दोहरा व्यवहार क्यों? वो भी तो किसी के माँ-बाप हैं, हमारे बुजुर्ग हैं। अगर उन्होंने कभी किसी बात पर टोक दिया या कुछ समझा दिया, तो आज के बच्चों को यह अपनी लाइफ में ‘इंटरफेरेंस’ (दखलअंदाज़ी) क्यों लगने लगता है?
अकेलेपन का दर्द और अधूरी ख्वाहिशें
आजकल हर किसी को अपनी आज़ादी पसंद है, किसी की टोक-टाक अच्छी नहीं लगती। बेटा-बहू तो अपनी दुनिया अलग बसा लेते हैं, पर क्या कभी उन्होंने सोचा है कि उस उम्र और पड़ाव में वो बुजुर्ग माता-पिता अकेले कैसे रहेंगे? अपनी ज़िंदगी गुज़ारने के लिए क्या इस उम्र में वो फिर से सब कुछ शुरू करेंगे?
माँ-बाप जब बच्चों की परवरिश करते हैं, तो हमेशा यही सोचते हैं कि आज वो बच्चों का सहारा बन रहे हैं, कल यही बच्चे बुढ़ापे में उनकी लाठी बनेंगे। पर उन्हें क्या पता कि वही बच्चे बड़े होकर उन्हें अपनी ‘फैमिली’ का हिस्सा भी नहीं मानेंगे। जब बेटा अपनी पत्नी और बच्चों को ही अपनी फैमिली बताने लगता है, तो उन बुजुर्गों के दिल पर क्या गुज़रती होगी? क्या वो माँ-बाप उसकी फैमिली नहीं हैं?
पोते-पोतियों से दूरी—एक और गहरा दर्द
कहते हैं कि पोते-पोती दादा-दादी का दूसरा जन्म होते हैं। उन्हें देखकर बुजुर्ग अपने बच्चों का वो बचपन दोबारा जीते हैं, जिसे वो अपनी जवानी में मेहनत करने और बच्चों का भविष्य बनाने के चक्कर में ठीक से देख भी नहीं पाए थे। लेकिन आज बहुत से बुजुर्गों को यह खुशी नसीब ही नहीं होती। उन्हें अपने ही जिगर के टुकड़ों से दूर कर दिया जाता है।
समाज का दोहरा चेहरा और सीख
एक और कड़वा सच यह है कि जो बेटियां अपने मायके जाकर अपनी भाभियों को समझाती हैं कि “मेरे मम्मी-पापा के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करती हो?”, वही बेटियां अपनी ससुराल में अपने सास-ससुर के साथ कैसा बर्ताव करती हैं, यह कोई उनसे पूछे!
यहाँ तक कि कुछ माता-पिता भी अपनी बेटियों को ससुराल में सास-ससुर की सेवा न करने या उनसे अलग रहने की गलत सीख देते हैं। न तो वो बेटियां सोचती हैं और न ही उनके माँ-बाप कि ऐसा करके वो किसी और के माता-पिता का दिल तोड़ रहे हैं।
मेरी आप सभी से गुज़ारिश (Conclusion)
दोस्तों, थोड़ा ठहरिए और सोचिए! जो आज उन बुजुर्गों का ‘आज’ है, वही कल हमारा ‘कल’ होने वाला है। समय का पहिया घूमकर वापस वहीं आता है। याद रखिएगा—हमारी दुनिया गोल है! जैसा आज हम दूसरों के माँ-बाप के साथ करेंगे, कल हमारे बच्चे भी हमारे साथ वैसा ही कर सकते हैं।
सास-ससुर को सिर्फ एक रिश्ता मत समझिए, उन्हें अपने माता-पिता की तरह सम्मान दीजिए। इस विषय पर आपकी क्या राय है? मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएं।
