ॐ सूर्याय नमः
‘हमारी दुनिया’ के प्यारे पाठकों, आप सभी का ‘मम्मी-पापा की जीवन यात्रा’ के दसवें भाग में बहुत-बहुत स्वागत है। पिछले भाग में आपने पढ़ा कि कैसे तीन बेटियों के आगमन के बाद भी हमारे छोटे से घर में दादी की हरी-भरी बगिया और शुद्ध खान-पान के साथ खुशियों का माहौल था। आज की कहानी में हम आपको बताएंगे कि कैसे संघर्ष के बीच भी मम्मी-पापा ने हमारी पढ़ाई-लिखाई को अपनी सबसे बड़ी प्राथमिकता बनाया।
बेटियों की पढ़ाई और मम्मी-पापा का संकल्प
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था और अब हम तीनों बहनें बड़ी हो रही थीं। उस दौर में गांवों में लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर लोग ज्यादा गंभीर नहीं होते थे। कई लोग कहते थे कि “बेटियों को ज्यादा पढ़ाकर क्या करना है, आखिरकार संभालना तो चूल्हा-चौका ही है।”
लेकिन मेरे मम्मी-पापा की सोच समाज से बिल्कुल अलग और बहुत आगे की थी। मम्मी खुद एक शिक्षिका (Teacher) थीं, इसलिए वे शिक्षा की कीमत बहुत अच्छे से जानती थीं। पापा भले ही सीधे-साधे किसान थे, लेकिन उनका भी एक ही सपना था—अपनी तीनों बेटियों को पैरों पर खड़ा करना। उन्होंने तय कर लिया था कि चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, चाहे खुद भूखे रहना पड़े, लेकिन अपनी बेटियों की पढ़ाई में कोई कमी नहीं आने देंगे। हमें एक अच्छे स्कूल में डाला गया, और पढ़ाई के मामले में मम्मी घर पर भी बहुत सख्त रहती थीं।
घर मे ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ टीवी: पूरे मोहल्ले का जमावड़ा
उसी दौर में हमारी जिंदगी में एक और बड़ा बदलाव था। पापा मम्मी की शादी में एक छोटा सा ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ (Black & White) टीवी आया था। उन दिनों पूरे मोहल्ले या गली में किसी एक ही घर में टीवी हुआ करता था।
हमारे घर में टीवी था, वह सिर्फ हमारा नहीं, बल्कि पूरे पड़ोस का मनोरंजन का साधन बन गया। रविवार के दिन जब ‘रामायण’ या ‘महाभारत’ जैसे सीरियल आते थे, तो हमारा छोटा सा घर और आंगन लोगों से खचाखच भर जाता था। कोई चटाई बिछाकर बैठता, तो कोई जमीन पर ही बैठ जाता। बिजली की आंख-मिचौली के बीच जब सब साथ बैठकर टीवी देखते थे, तो वो सामूहिक खुशी देखने लायक होती थी।
सुविधाओं की कमी, हौसलों की उड़ान
बेशक हमारे पास आज की तरह सुख-सुविधाएं, बड़ा बंगला या गाड़ियां नहीं थीं। हम आज भी उसी छोटे से घर में रहते थे, जहां गर्मियों में सिर्फ एक ही टेबल फैन के भरोसे रातें कटती थीं। लेकिन मम्मी-पापा के दिए संस्कार और दादी के लाड-प्यार ने हमें कभी यह महसूस ही नहीं होने दिया कि हमारे पास किसी चीज की कमी है। हम तीनों बहनें एक-दूसरे की सहेलियां थीं और अपनी छोटी सी दुनिया में बेहद संतुष्ट और खुश थीं।
मम्मी सुबह स्कूल जातीं, फिर आकर घर संभालतीं और पापा दिन भर धूप में खेतों में पसीना बहाते। दोनों मिलकर हमारे भविष्य की वो मजबूत नींव रख रहे थे, जिसका फल हमें आगे चलकर मिलने वाला था।
आगे क्या हुआ?
मम्मी-पापा के इस त्याग और शिक्षा के प्रति उनके इस जज्बे ने हमारी जिंदगी को कैसे बदला? क्या आगे चलकर इस छोटे से गांव की तीन बेटियों ने समाज की सोच को बदला? इस प्रेरणादायक सफर का अगला और सबसे महत्वपूर्ण मोड़ हम आपको बताएंगे अगले भाग में।
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आज का विचार: आपके बचपन की ऐसी कौन सी चीज या याद है जो आज के महंगे साधनों से भी ज्यादा आपको खुशी देती थी? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी यादें हमारे साथ जरूर शेयर करें।
जल्द ही मिलेंगे भाग-11 के साथ, तब तक के लिए अपना और अपने परिवार का ख्याल रखें।
राधे-राधे जी! 🙏

Bhut ache din the wo ab to kabhi vapas nahi aa sakte h miss you pehle Wale din na koi tansion or bas khel kud or padna ka time toda sa
Wo din ab apne baccho me or chote bhen bhai me dekhkar bhi khush ho jate h