ॐ सूर्याय नमः
‘हमारी दुनिया’ के प्यारे पाठकों, आप सभी का ‘मम्मी-पापा की जीवन यात्रा’ के नौवें भाग में बहुत-बहुत स्वागत है। पिछले भाग में हमने बात की थी मम्मी-पापा के उस कठिन संघर्ष की, जहाँ उन्होंने दिन-रात एक करके, मेहनत मजदूरी से अपने परिवार का पालन-पोषण शुरू किया था। आज की कहानी में देखिए कि कैसे मुश्किलों के बीच भी उन्होंने अपने आशियाने को खुशियों से महकाए रखा।
घर में आई एक और नन्ही कली
समय बीतने के साथ, हमारे घर में एक और नन्ही बेटी का जन्म हुआ। समाज चाहे जो सोचे, लेकिन मेरे मम्मी-पापा और दादी इस बात से जरा भी दुखी नहीं थे। वे बेहद खुश थे। अब हम तीन बहनें हो चुकी थीं। उस दौर में मम्मी ने एक शिक्षिका (Teacher) के रूप में काम करना शुरू कर दिया था और पापा गांव में ही किसानी करते थे।
हम लोग गांव के बीचो-बीच बने एक छोटे से घर में रहते थे। हमारा ‘घेर’ (पशुओं को रखने और खेती का सामान रखने की जगह) गांव से थोड़ा बाहर था। उन दिनों आज की तरह सुख-सुविधाएं नहीं थीं। पूरे घर में सिर्फ एक टेबल फैन हुआ करता था और बिजली (Light) भी बहुत कम आती थी। इसलिए, गर्मी के दिनों में हम सब घर के खुले आंगन में सोया करते थे। हमारे घेर में बहुत सारे पेड़-पौधे लगे थे, जहाँ से बेहद ठंडी और शुद्ध हवा आती थी। पापा अक्सर उसी घेर में खुले आसमान के नीचे सोते थे। हम तीनों बहनें अपनी प्यारी दादी की गोद में खेल-कूद कर बड़ी हुईं। इतने संघर्षों के बाद भी हमारा परिवार बहुत खुशहाल था।
दादी की आत्मनिर्भर बगिया: शुद्ध खान-पान और अपनत्व
एक दिन हमारी दादी ने घेर के खाली पड़े प्लॉट में सब्जियां उगाने का फैसला किया। इस काम में हम सब बहनों और मम्मी-पापा ने भी उनकी पूरी मदद की। हम वो सब्जियां बेचते नहीं थे, बल्कि सिर्फ अपने घर के खाने के लिए उगाते थे।
देखते ही देखते हमारी वो बगिया इतनी हरी-भरी हो गई कि वहाँ बैंगन, तोरई, लौकी, कद्दू (काशीफल), भिंडी, करेला, टमाटर, मिर्च, धनिया, पुदीना, मूली, मेथी, पालक, बथुआ, सरसों, गाजर और यहाँ तक कि पपीता जैसी ढेरों चीजें उगने लगीं।
सब्जियों के साथ-साथ हमारे प्लॉट में गेंदा, गुड़हल, कनेर और सदाबहार के सुंदर फूल भी खिलते थे। साथ ही जामुन और अमरूद के पेड़ भी लहलहाते थे। हमारी बगिया इतनी समृद्ध थी कि हमारी ताइयाँ भी अक्सर हमारे यहाँ से ताज़ी सब्जियां और फूल तोड़कर ले जाती थीं। अब हमारे पास घर की शुद्ध सब्जियां थीं, ताज़े फल और फूल थे। ऊपर से गाय-भैंसों की वजह से शुद्ध दूध, दही और घी भी घर का ही होने लगा था। जीवन में संघर्ष ज़रूर था, लेकिन थाली में शुद्धता और रिश्तों में मिठास थी।
आपके विचार और अगला भाग
ऐसी संघर्षभरी जिंदगी में भी मम्मी-पापा ने कभी हार नहीं मानी और हर परिस्थिति को हंसकर गले लगाया। उनके इस हौसले और जज्बे को आप क्या नाम देना चाहेंगे? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय हमें ज़रूर बताएं।
इस सफर की आगे की कहानी (भाग-10) जानने के लिए हमारी वेबसाइट ‘हमारी दुनिया’ के साथ जुड़े रहिए।
जल्द ही मिलेंगे अगले भाग में, तब तक के लिए अपना और अपनों का ख्याल रखें।
राधे-राधे जी! 🙏

