नमस्कार दोस्तों, ‘हमारी दुनिया’ (humariduniya.in) में आप सभी का स्वागत है। ओम नमः शिवाय। ✨
आज सोमवार है ओर आज हमारी दुनिया में हम बात करेंगे ‘हमारे बुजुर्गों की आज मैं आपके सामने एक ऐसा सवाल रखने जा रही हूँ, जिसका जवाब आज के समय में ढूंढना बेहद ज़रूरी हो गया है।
पाई-पाई का त्याग और बुढ़ापे की लाचारी
दोस्तों, आख़िर ऐसा क्यों होता है कि जो माँ-बाप अपने बच्चों के सपनों के लिए, उनकी खुशी के लिए अपनी पूरी कमाई की पाई-पाई हंसते-हंसते खर्च कर देते हैं, उन्हीं माँ-बाप को बुढ़ापे में अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए बच्चों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है?
और दुःख की बात देखिए, बच्चे उन्हें यह कहकर झिड़क देते हैं— “क्या ज़रूरत है अभी इस चीज़ की? मेरे पास फ़ालतू के पैसे नहीं हैं। बहुत खर्चा है, कहाँ से लाऊँ इतना पैसा? मेरा अपना भी तो खर्च है।”
‘मैंने ही ठेका थोड़ी ले रखा है…’
परेशानी तब और बढ़ जाती है जब घर में एक से ज़्यादा भाई-बहन होते हैं। तब वे बहुत आसानी से एक बात बोल देते हैं— “अगर मेरे पास आपको इतनी ही दिक़्क़त (दुःख) है, तो किसी और के पास चले जाओ। और भी तो बच्चे हैं आपके, उनके पास क्यों नहीं चले जाते? मैंने ही ठेका थोड़ी ले रखा है आपका! जन्म तो सबको दिया है, फिर मैं ही क्यों सारा खर्चा उठाऊँ? मेरी अपनी भी तो फैमिली है, उन्हें भी तो पालना है।”
जब ये कड़वे शब्द बूढ़े माँ-बाप के कानों में पड़ते होंगे, तो सोचिए उनके दिल पर क्या गुज़रती होगी? क्या यह सब सही है?
एक कड़वा गणित
सोचिए, अकेले माँ-बाप मिलकर 4-5 बच्चों को हंसते-हंसते पाल लेते हैं, और वो भी पूरे 18-20 सालों तक। लेकिन वही 4-5 बच्चे मिलकर अपने बूढ़े माँ-बाप को 5-7 साल भी ठीक से संभाल नहीं पाते! क्यों ऐसा क्यों है? जबकि उनको अच्छे से पता होता हैं कि इनके पास ज्यादा वक़्त नहीं कब्ज भी ये हमेशा के लिए हमारी दुनिया से जा सकते है फिर भी ऐसा क्यों है
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएं।

