आज ‘हमारी दुनिया’ में मैं अपने दिल के एक ऐसे टुकड़े की कहानी साझा कर रही हूँ, जो आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन हमारी यादों में हमेशा जीवित रहेगा—हमारा प्यारा डॉग ‘भूरू’।बात आज से करीब 5 साल पहले की है। भूरू तब एक बहुत छोटा सा मासूम बच्चा था। नियति का खेल देखिए, उसकी माँ की मौत हो चुकी थी और वह इस बड़ी दुनिया में बिल्कुल अकेला, अनाथ हो गया था। इतना छोटा कि ठीक से चल भी नहीं पाता था। भटकते-भटकते वह एक दिन हमारे घर के मेन गेट पर आकर बैठ गया। जब हमने उसे देखा, तो हमसे रहा नहीं गया। वह बहुत डरा हुआ और सहमा हुआ था। हमने तुरंत उसे अपने घर के अंदर ले लिया। मुझे आज भी याद है, जब मैंने पहली बार उसकी आँखों में देखा था—उसकी आँखें इतनी प्यारी और मासूम थीं, लेकिन उनमें एक अजीब सी गहरी खामोशी और दुःख था, जैसे वह अपनी माँ को ढूंढ रहा हो।उस दिन के बाद से उस खामोश आँखों वाले छोटे से बच्चे ने हमारे घर को ही अपनी पूरी दुनिया बना लिया। वह मम्मी-पापा को बिल्कुल एक बच्चे की तरह देखता था, उनकी बातें सुनता था और हम भाई-बहनों के साथ एक सगे भाई की तरह रहता था। मैं जब भी ऑफिस की छुट्टियों में घर जाती, या छोटा भाई और बहन स्कूल की छुट्टियों में घर आते, भूरू पहले से ही गेट पर हमारा इंतज़ार कर रहा होता था। हमें देखते ही वह खुशी से पागल हो जाता, कूदने लगता और अपनी पूंछ को इतनी तेज़ी से हिलाता कि उसकी खुशी साफ़ दिखती थी। उसे बिस्किट बहुत पसंद थे और बिस्किट खाकर वह बेहद खुश होता था। उसे मिठाइयाँ भी बहुत पसंद थीं, पर हम उसे बहुत कम देते थे क्योंकि मीठा डॉग्स की सेहत को नुकसान पहुँचाता है।भूरू की आदतें इतनी समझदार थीं कि कोई इंसान भी क्या होगा। वह अंदर आकर हमेशा किचन के सामने पायदान पर सो जाता था, जैसे कोई छोटा बच्चा सो रहा हो। उसने कभी किचन के अंदर पैर नहीं रखा, और न ही किसी दूसरे जानवर को किचन में जाने दिया। जब तक उसे कोई चीज़ खाने के लिए देकर यह न बोला जाए कि ‘खा ले’, वह उसे छूता तक नहीं था। अगर उसका पेट भर जाता, तो वह खाना छोड़ कर अलग बैठ जाता था। उसने कभी किसी और के घर का कुछ नहीं खाया। उसे हम सबके साथ रहना और खेलना बहुत पसंद था। जब मेरी बहनों के बच्चे घर आते, तो वे प्यार और नासमझी में भूरू के कान और पैर पकड़ लेते थे, लेकिन भूरू ने कभी किसी बच्चे को नहीं काटा, वह उनके साथ भी बड़े प्यार से खेलता था।वह कितनी भी दूर घूमने गया हो, अगर हम दूर से आवाज लगाते ‘भूरू’, तो वह दौड़ता हुआ चला आता था। वह इतना समझदार था कि अपने आप पैर से गेट खोल लेता था। उसे पानी से बहुत डर लगता था, नहाने के नाम पर वह रोने लगता था, लेकिन उसे एसी और पंखे की हवा बहुत पसंद थी। वह हमेशा वहीं आकर सोता था। रात के समय गेट पर एक कुर्सी डाली हुई थी, वह पूरी रात उस कुर्सी पर बैठकर घर की रखवाली करता था। उसके होते हुए किसी अनजान व्यक्ति या जानवर की हिम्मत नहीं थी कि घर के अंदर कदम भी रख दे। उसे अपने पेट पर हाथ फिरवाना बहुत पसंद था, घर में कोई भी जहाँ जाता, भूरू उसके पीछे-पीछे साथ-साथ जाता था। घर पर जो कैमरे लगे हैं, जब हम बाहर से कैमरों के ज़रिए उससे बात करते और उसका नाम लेते, तो वह कैमरे की तरफ देखकर बहुत खुश होता था। वह हमारे परिवार का अहम हिस्सा बन चुका था, घर में जब भी कोई बात होती, भूरू के ज़िक्र के बिना कभी पूरी ही नहीं होती थी।लेकिन पिछले महीने हमारी दुनिया जैसे उजाड़ हो गई। उस दिन घर पर कोई नहीं था। जब मम्मी स्कूल से वापस आईं, तो भूरू गेट के सामने शांत लेटा हुआ था। मम्मी ने आवाज़ दी—’भूरू… भूरू…’, लेकिन वह नहीं उठा। मम्मी ने पास जाकर देखा तो उसकी सांसें थम चुकी थीं और जीभ नीली पड़ गई थी। भूरू अचानक हम सबको छोड़कर हमेशा के लिए चला गया था। पता नहीं कैसे अचानक से हम सबकी हंसती-खेलती दुनिया एक पल में बिखर सी गई। मम्मी-पापा ने भारी मन से उसे अच्छे से नहलाया, तैयार किया और रोते हुए उसकी अंतिम विदाई की।सब कुछ बिखर गया था, घर में सिर्फ उसका सूनापन था। लेकिन फिर एक चमत्कार हुआ! कुछ दिनों बाद भूरू का एक छोटा सा बच्चा हमारे घर आया, जो बिल्कुल अपने पिता ‘भूरू’ की कार्बन कॉपी है। वह अपनी माँ और भाई के साथ आया था, और जब हमने उसे सिर्फ एक बार प्यार से ‘भूरू’ कहकर पुकारा, तो वह दौड़ता हुआ हमारे पास आ गया। ऐसा लगा जैसे हमारा पुराना भूरू हमसे दूर जा ही नहीं पाया और अपने बच्चे के रूप में हमारे पास वापस लौट आया। वह भी अपने पापा की तरह बहुत क्यूट और नटखट है। अब घर में सब फिर से खुश हैं, लेकिन हमारे पहले भूरू की यादें हमेशा हमारे दिलों में रहेंगी। भूरू, हम सब तुमसे बहुत प्यार करते हैं और तुम्हें हमेशा मिस करेंगे।
