ओम शं शनैश्चराय नमः।
नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आपका आपकी अपनी वेबसाइट ‘हमारी दुनिया’ (humariduniya.in) में।
हमारी खास सीरीज़ ‘स्वाभिमान’ के भाग-3 में आज मैं एक ऐसी शख्सियत के बारे में बात करने जा रही हूँ, जिनके बिना मेरी दुनिया अधूरी है। वो कोई और नहीं, बल्कि मेरी बड़ी दीदी—बुलबुल दीदी (वंदना दीदी) हैं। मैं खुद घर में दूसरे नंबर पर हूँ, इसलिए मेरे लिए तो पूरी दुनिया में बस वही एक इकलौती दीदी हैं। वो मेरे लिए सिर्फ एक बहन नहीं, बल्कि मेरी माँ और मेरी सबसे पक्की दोस्त भी हैं।
🌹 उम्र से पहले ज़िम्मेदारियों का बोझ
हमारी बुलबुल दीदी का जन्म 14 फरवरी को हुआ था—मानो वो मम्मी-पापा के अटूट प्यार की एक खूबसूरत निशानी बनकर हमारे जीवन में आईं। घर में सबसे बड़ी होने के कारण, ज़िम्मेदारियाँ भी सबसे पहले और सबसे ज़्यादा उन्हीं के कंधों पर आईं।
वो अपनी उम्र से पहले ही बड़ी हो गईं। खासकर मेरे जन्म के बाद तो वो सचमुच एक माँ की तरह मेरा ख्याल रखने लगीं। मम्मी का घर के कामों में हाथ बंटाना, अपनी पढ़ाई करना… इन सब के बीच कहीं न कहीं उनकी बचपन की मासूमियत दबकर रह गई। वो समय से पहले ही बेहद समझदार, गंभीर और थोड़ी स्ट्रिक्ट (सख्त) बड़ी बहन और बेटी बन गईं।
🎒 गाँव का संघर्ष और मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई
इसके बाद हमारी छोटी बहन ज्योति का जन्म हुआ, तो दीदी की ज़िम्मेदारियाँ और बढ़ गईं। हमारी मम्मी एक टीचर थीं और वो भी अनुशासन के मामले में काफी सख्त थीं। हम लोग गाँव में रहते थे। मम्मी और पापा दिन-रात एक कर देते थे ताकि हमें अच्छी शिक्षा और बेहतरीन परवरिश मिल सके। उनकी इस कड़ी मेहनत में बुलबुल दीदी उनका सबसे बड़ा सपोर्ट सिस्टम बनीं।
दीदी घर का काम संभालतीं, हम छोटे भाई-बहनों की देखरेख करतीं और इन सबके साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखतीं। वो पढ़ाई में बहुत तेज़ थीं। हमारे गाँव में आगे की पढ़ाई के लिए स्कूल नहीं था, इसलिए वो साइकिल से दूसरे गाँव पढ़ने जाती थीं। मैं भी उनके साथ ही साइकिल पर जाती थी। स्कूल से लौटकर वो फिर दूसरे गाँव ट्यूशन पढ़ने जातीं, वहाँ से आकर घर का काम करतीं और फिर देर रात तक पढ़ाई करती थीं।
एक भावुक याद: उन दिनों हमारे घर में इन्वर्टर जैसी सुविधा नहीं थी। दीदी पहले मोमबत्ती जलाकर पढ़ा करती थीं। फिर पापा ने उनकी मेहनत को देखकर एक छोटी बैटरी ला कर दी और टेबल पर एक छोटा सा बल्ब लगा दिया, जिसकी रोशनी में वो रात-रात भर जागती थीं। इतनी कम उम्र में इतनी थकान और मानसिक दबाव की वजह से वो अक्सर चुपचाप और थोड़े गुस्से में रहने लगी थीं।
🏢 गाँव से शहर तक का सफ़र
जब कॉलेज की पढ़ाई का समय आया, तो उन्हें गाँव से शहर जाना पड़ा। रोज़ आने-जाने में बहुत परेशानी होती थी, इसलिए पापा ने शहर में उनके लिए एक कमरा किराए (Rent) पर ले लिया। धीरे-धीरे हम सारे भाई-बहन भी दीदी के पास उसी किराए के कमरे में रहने चले गए। लेकिन वहाँ जगह और पैसों की दिक्कत होने लगी, तो पापा ने हिम्मत करके शहर में एक छोटा सा घर खरीद लिया।
अब हम सब भाई-बहन दीदी के साथ अपने नए घर में रहने लगे। दीदी वहाँ हम सबको (अभय और शिखा को भी) पढ़ाती थीं और खुद की पढ़ाई भी करती थीं। उन्होंने अपनी मेहनत के दम पर M.Sc. पूरी की और तुरंत जॉब (Job) शुरू कर दी। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने MBA भी किया और फिर एक अच्छे परिवार में उनकी शादी हो गई। आज उनकी एक बहुत प्यारी सी बेटी है—किया (Kiya)।
💞 मेरी प्रेरणा: दुनिया की सबसे बेस्ट दीदी
बुलबुल दीदी ने अपनी ज़िंदगी में बहुत संघर्ष किया है और आज भी वो परिवार के लिए उतनी ही मेहनत करती हैं। लेकिन मेरी दीदी अंदर से बहुत स्ट्रॉन्ग (मजूबत) हैं। मुझे उनका फैशन सेंस और उनके हाथ का बना खाना बहुत ज़्यादा पसंद है।
आज भी, जब कभी मैं किसी मुश्किल में होती हूँ या परेशान होती हूँ, तो मुझे सबसे पहले अपनी दीदी की ही याद आती है। मैं भी उनकी जैसी एक अच्छी और ज़िम्मेदार बहन बनने की पूरी कोशिश कर रही हूँ, पर वो तो मेरी बुलबुल दीदी हैं—दुनिया की सबसे बेस्ट दीदी! आई लव यू दीदी!
भगवान से मेरी यही प्रार्थना है कि हमारी इस दुनिया में हर किसी को ऐसी ही प्यार और परवाह करने वाली बड़ी बहन मिले। ईश्वर मेरी दीदी की हमेशा रक्षा करना और उन्हें दुनिया की सारी खुशियाँ देना।
ओम हनुमते नमः।
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