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भाग 5 में हमने आपको बताया था कि मम्मी-पापा की कहानी राना डिग्री कॉलेज (पिलखुवा) से कैसे शुरू हुई थी। आज हम बात करेंगे उनके लव स्टोरी से शादी तक के उस यादगार सफर की, जो इतना आसान नहीं था।
कस्बे और गाँव का फासला
मम्मी कस्बे में रहती थीं और पापा गाँव में। यही वजह थी कि यह शादी इतनी आसानी से होनी मुमकिन नहीं थी। शुरुआत में नानाजी और मामाजी को यह रिश्ता बिल्कुल भी मंजूर नहीं था। लेकिन आखिरकार, अपनी बेटी (मम्मी) की खुशी की खातिर उन्होंने एक कदम आगे बढ़ाया। वे पापा को देखने के लिए उनके घर आए। वहाँ पापा और दादाजी से मिलकर उन्हें बहुत अच्छा लगा, जिसके बाद शादी की बात आगे बढ़ सकी।
खुशी के बीच एक बड़ा संकट
इस बीच पापा की NTPC में जॉब लग गई और जल्द ही दोनों की सगाई भी हो गई। लेकिन खुशियों के इस माहौल के बीच परिवार पर एक बड़ा दुख टूट पड़ा। सगाई के कुछ समय बाद ही दादाजी का निधन हो गया, वे कैंसर से पीड़ित थे।
दादाजी का आखिरी फैसला और मामाजी का साथ
जाते-जाते दादाजी पापा के मामाजी को एक बड़ी जिम्मेदारी सौंप गए। उन्होंने कहा कि पापा की शादी हर हाल में मम्मी से ही कराई जाए। असल में, ताऊजी और परिवार के कुछ अन्य लोगों को यह शादी पसंद नहीं थी। लेकिन पापा के मामाजी के सामने कोई कुछ बोल नहीं पाता था। दादाजी के दिए वचन और अपनी मजबूत बात के दम पर मामाजी ने ही मम्मी-पापा की शादी कराई।
प्यार को मिली मंजिल
आखिरकार, तमाम अड़चनों और अपनों के विरोध के बाद दोनों को अपने प्यार की मंजिल मिल ही गई। दोनों का विवाह संपन्न हुआ। लेकिन ठहरिए! यह इस खूबसूरत जीवन यात्रा का अंत नहीं है, बल्कि यहाँ से तो मम्मी-पापा के असल जीवन की शुरुआत होती है।
मम्मी-पापा की आगे की जीवन यात्रा कैसी रही? जानने के लिए मिलते हैं अगले भाग में!

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