नमस्कार दोस्तों! आप सभी का स्वागत है हमारी दुनिया में।
पिछले भाग (भाग 4) में मैंने आपको बताया था कि कैसे पिलखुवा के मशहूर ‘राणा डिग्री कॉलेज’ के कैंपस में अलग-अलग क्लास होने के बावजूद नोट्स के बहाने मम्मी-पापा के दिलों के तार जुड़े थे। कॉलेज के उन दिनों में उनके प्यार में एक गजब का ठहराव, मर्यादा और इज्जत हुआ करती थी। आज ‘हमारे अनकहे हीरो’ के इस पांचवें भाग में हम कॉलेज के दिनों से थोड़ा और आगे बढ़ेंगे और जानेंगे कि शादी के शुरुआती दिनों और उस दौर की मुलाकातों में कितनी मासूमियत हुआ करती थी।
कॉमन दोस्त और चाय की वो दुकान
कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद जब दोनों के रिश्ते की बात आगे बढ़ी, तो उन दिनों की कुछ बेहद दिलचस्प यादें आज भी हमारे घर में हंसने का बहाना बनती हैं। दरअसल, मम्मी और पापा का जो फ्रेंड सर्कल (दोस्तों का ग्रुप) था, वो लगभग पूरी तरह से कॉमन था। दोनों के दोस्त एक ही थे, इसलिए बातचीत और मुलाकातों के बहाने भी बहुत ही अनोखे और देसी हुआ करते थे।
उन दिनों पापा अक्सर अपने दोस्तों की टोली के साथ मम्मी के घर के पास मौजूद एक छोटी सी दुकान पर चाय पीने जाया करते थे। चाय के कप से उठते धुएं और दोस्तों के ठहाकों के बीच, पापा की नजरें हमेशा मम्मी के घर की तरफ ही टिकी रहती थीं।
छत का वो कोना और अदब का नजारा
दूसरी तरफ, मम्मी को भी दोस्तों के आने और पापा की मौजूदगी का अंदाजा हो जाता था। जैसे ही पापा दुकान पर पहुंचते, मम्मी अक्सर किसी न किसी बहाने से घर की छत पर आ जाती थीं। छत के उसी कोने से वो चुपके से नीचे चाय की दुकान पर बैठे पापा को देख लिया करती थीं।
आज के दौर में जहाँ फोन कॉल्स, चैट्स और वीडियो कॉल्स पर घंटों बातें होती हैं, उस जमाने का रोमांस बिल्कुल अलग और रूहानी था। दोनों एक-दूसरे को देखते जरूर थे, लेकिन उस देखने में गजब की मर्यादा और सम्मान (रिस्पेक्ट) होता था। पापा नीचे दुकान पर बैठकर कभी शालीनता की सीमा पार नहीं करते थे और मम्मी भी छत से बस एक नजर देखकर, बिना कुछ बोले, चुपचाप नजरें झुकाकर नीचे चली जाती थीं। दोनों के बीच कोई लंबी बातचीत नहीं होती थी, लेकिन उस खामोशी में भी एक-दूसरे के लिए बेहद इज्जत और एक गहरा रिश्ता गहराता जा रहा था।
संस्कारों की यही है असली ताकत
रिश्ते की इसी तहज़ीब और मर्यादा ने आगे चलकर हमारे पूरे परिवार की मजबूत नींव रखी। आज जब हमारी चार बहनें कामयाबी के इस मुकाम पर हैं, हमारा ‘OM’ यूट्यूब चैनल वेरिफाइड हो चुका है, और हमारी दुनिया इतनी खुशहाल है, तो हमें साफ समझ आता है कि यह सब मम्मी-पापा के उन्हीं ऊंचे संस्कारों और मर्यादा का ही फल है। जो रिश्ता इतने आदर से शुरू हुआ हो, उसका आगे चलकर एक आदर्श परिवार बनना तो तय ही था।
निष्कर्ष
मम्मी-पापा की इस जीवन यात्रा का यह खूबसूरत किस्सा हमें सिखाता है कि रिश्तों की असली खूबसूरती और मजबूती एक-दूसरे के प्रति ‘सम्मान’ रखने में ही है। आज भी जब पूरा परिवार साथ बैठता है और हम मम्मी-पापा को उस चाय की दुकान और छत वाले दिनों की याद दिलाते हैं, तो दोनों के चेहरे पर वही पुरानी, शर्मीली और प्यारी सी मुस्कान तैर जाती है।
आपको मम्मी-पापा की शुरुआती जिंदगी का यह अनसुना और फिल्मी किस्सा कैसा लगा? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें।
जय माता दी, ओम नमः शिवाय!
“सच में दिल छू लिया इस भाग ने! पुराने जमाने के प्यार और मुलाकातों में जो अदब, तहज़ीब और मर्यादा होती थी, वो आज के दौर में गायब हो चुकी है। छत से चुपके से देखना और बिना कुछ बोले इतनी इज्जत रखना—यह कहानी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं लगी। आपके मम्मी-पापा को मेरा सादर प्रणाम। अगले भाग का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा! 🙏✨
Coming soon 🙏
मम्मी-पापा, आपकी यह जीवन यात्रा हम सबके लिए एक खूबसूरत प्रेरणा है। आप दोनों की जोड़ी हमेशा सलामत रहे! ❤️
🙏
🙏 thanks
💯
Very nice 🙂
Thanks