ॐ सूर्याय नमः
नमस्कार दोस्तों! आप सभी का ‘हमारी दुनिया’ की सबसे पसंदीदा सीरीज़ ‘मम्मी-पापा की जीवन यात्रा’ के ग्यारहवें भाग में बहुत-बहुत स्वागत है.
पिछले भाग में हमने आपको अपने घर के उस पहले ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ टीवी और मोहल्ले के जमावड़े की खूबसूरत यादों के बारे में बताया था. आज हम बात करेंगे हमारे स्कूल के दिनों की, और उस बड़े फैसले की जिसने हमारे भविष्य की दिशा ही बदल दी.
गांव का माहौल और सरकारी स्कूल का सच
जैसा कि आप सब जानते हैं, उस दौर में गांवों में ज्यादातर सरकारी स्कूल ही हुआ करते थे। वहां पढ़ाई-लिखाई के नाम पर सिर्फ औपचारिकता पूरी की जाती थी, पढ़ाई ठीक से नहीं होती थी. गांव के ज्यादातर बच्चे मजबूरी में या बिना किसी बड़े लक्ष्य के उन्हीं स्कूलों में पढ़ने जाते थे. खासकर लड़कियों के मामले में तो गांव के लोगों की सोच यही थी कि “बस नाम मात्र की पढ़ाई करवा दो, आगे चलकर तो चूल्हा-चौका ही संभालना है”.
लेकिन हमारे मम्मी-पापा की सोच इस ढर्रे से बिल्कुल अलग थी. उनका मकसद हमें सिर्फ नाम की पढ़ाई देना नहीं था, बल्कि वे चाहते थे कि हम जीवन में सचमुच अच्छी शिक्षा हासिल करें और अपने पैरों पर खड़ी होकर कामयाब बनें.
कम कमाई और प्राइवेट स्कूल का बड़ा खर्च
इसी सोच के साथ उन्होंने समाज और गांव के चलन के खिलाफ जाकर हम बहनों का दाखिला एक प्राइवेट स्कूल में करवाया.
अब ज़रा रुककर उस दौर के हालातों के बारे में सोचिए… खेती की सीमित और अनिश्चित कमाई, मम्मी की छोटी सी नौकरी, घर में बुजुर्ग दादी की देखभाल और ऊपर से तीन-तीन बेटियों की परवरिश और प्राइवेट स्कूल की महंगी फीस! यह सब उन्होंने कैसे मैनेज किया होगा? [1]
कितनी बार उन्होंने अपनी दवाइयां टाली होंगी, कितनी बार उन्होंने त्योहारों पर अपने लिए नए कपड़े नहीं खरीदे होंगे, ताकि हमारी स्कूल की फीस समय पर जमा हो सके! यह सोचकर ही दिल भर आता है।
माता-पिता का बिना स्वार्थ का त्याग: एक गहरा सवाल
इसीलिए तो कहा जाता है कि माता-पिता का संघर्ष दुनिया में सबसे बड़ा होता है. वे अपने बच्चों के भविष्य को अपने खून-पसीने से सींचते हैं, और बदले में उनकी कोई बड़ी उम्मीद या स्वार्थ नहीं होता. वे जीवन भर कष्ट सहते हैं ताकि उनके बच्चे समाज में सिर उठाकर जी सकें।
बदले में वे हमसे क्या चाहते हैं? बस थोड़ी सी इज़्ज़त, थोड़ा सा सम्मान और ढेर सारा प्यार!
आज का विचार: क्या हम अपनी व्यस्त जिंदगियों में से निकालकर उन्हें वो थोड़ा सा प्यार और सम्मान भी नहीं दे सकते? अगर हम उन्हें खुश नहीं रख सकते, तो फिर हम अपनी ज़िंदगी में चाहे जितने बड़े बन जाएं, सब बेकार है। इस बारे में थोड़ा सोचिए और अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ ज़रूर शेयर करें.
आगे की कहानी जानने के लिए जुड़े रहिए humariduniya.in के साथ। जल्द ही मिलेंगे भाग-12 में।
राधे-राधे जी! 🙏

Very good
Very good
Very nice
Very thoughtful story
salut h ese mummy papa ko or esi family ko