ॐ सूर्याय नमः
नमस्कार दोस्तों! आप सभी का हमारी वेबसाइट ‘हमारी दुनिया’ की सबसे खास सीरीज़ ‘मम्मी-पापा की जीवन यात्रा’ के दसवें भाग में बहुत-बहुत स्वागत है।
पिछले भाग में हमने आपको अपनी छोटी बहन ज्योति के जन्म और दादी की उस हरी-भरी सुंदर बगिया के बारे में बताया था। आज भाग-10 में हम बात करेंगे कि तीन बेटियों के आगमन के बाद, मम्मी-पापा ने हमारे सुनहरे भविष्य के लिए अपने सुखों की कैसे आहुति दे दी।
सुबह 4 बजे से शुरू होती दिनचर्या
अब हम तीन बहनें हो चुकी थीं। ज़ाहिर है, जिम्मेदारियां भी तीन गुना बढ़ चुकी थीं। हमारे अच्छे भविष्य और परवरिश के लिए मम्मी और पापा दिन-रात एक करके मेहनत कर रहे थे। दोनों सुबह 4 बजे ही उठ जाते थे, और रात को काम खत्म करके कब सोना होता था, इसका कोई ठिकाना नहीं था।
उन दिनों मम्मी की नौकरी भले ही छोटी थी, लेकिन उस मुश्किल समय में वह हमारे लिए लाखों रुपये के बराबर थी। मम्मी का स्कूल तो गाँव में ही था, लेकिन अक्सर सरकारी मीटिंग या ट्रेनिंग के लिए मम्मी को 14-15 किलोमीटर दूर कस्बे या शहर जाना पड़ता था।
बिना किसी वाहन के 15 किलोमीटर का पैदल सफर
उस दौर में हमारे पास कोई गाड़ी, मोटरसाइकिल या साइकिल तक नहीं थी। ऐसे में मम्मी को उतनी दूर का सफर कड़कती धूप या कँपकँपाती ठंड में भी पैदल ही तय करना पड़ता था। जब हम छोटे बच्चे मम्मी को इतनी दूर पैदल जाते और थककर चूर होकर लौटते देखते थे, तो हमारा दिल भर आता था। बस मन में एक ही बात आती थी कि हम जल्दी से बड़े हो जाएं और मम्मी-पापा का यह दर्द बाँट लें।
पापा को भी मम्मी को इस हाल में देखकर बहुत दुःख होता था। लेकिन वे भी क्या करते? वे खुद खेतों में दिन-रात पसीना बहा रहे थे। पर आप तो जानते ही हैं कि पारंपरिक खेती से सीमित आय ही हो पाती है।
सीमित आय और जिम्मेदारियों का पहाड़
एक छोटी सी कमाई में तीन-तीन बेटियों को गाँव के सरकारी स्कूल के बजाय अच्छे प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना, घर का पूरा खर्च चलाना, और हमारी बुआ का त्योहारों पर मान-सम्मान (लेन-देन) करना—यह सब पापा को ही देखना था। इसके अलावा, चूँकि हमारी प्यारी दादी हमारे पास रहती थीं, इसलिए सभी रिश्तेदारों का आना-जाना भी हमारे ही घर लगा रहता था। मेहमानों की खातिरदारी में भी खर्च होता था। ऐसे में वाहन खरीदने के लिए पैसे कहाँ से बच पाते?
जो हमारे पास है, वही हमारी दौलत है
इतने सारे अभावों और संघर्षों के बावजूद, हमारा परिवार अंदर से बहुत खुश था। हमारे मन में कभी किसी चीज़ को लेकर मलाल नहीं रहा। हम हमेशा यही सोचते थे कि—“आज ईश्वर ने जो कुछ भी हमें दिया है, दुनिया में बहुत से लोगों को तो उतना भी नसीब नहीं होता।” इसी सकारात्मक सोच और संतुष्टि के साथ हमारी जिंदगी का यह खूबसूरत सफर आगे बढ़ता रहा।
आज का विचार: हमारी यह सोच आपको कैसी लगी? क्या सचमुच इंसान को विपरीत परिस्थितियों में भी उस चीज़ के लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा नहीं करना चाहिए, जो उसके पास है? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में हमारे साथ ज़रूर साझा करें।
इस प्रेरणादायक सफर का अगला मोड़ जानने के लिए जुड़े रहिए humariduniya.in के साथ। जल्द ही मिलेंगे भाग-11 में।
राधे-राधे जी! 🙏


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