आज ‘हमारी दुनिया’ में हम बात कर रहे हैं महिला सशक्तिकरण के सबसे महत्वपूर्ण पहलू—’सुरक्षा के अधिकार’ पर। हर मंच से यह दावा किया जाता है कि आज के दौर में बेटियां सुरक्षित हैं और वे आसमान छू रही हैं। लेकिन क्या वाकई ज़मीनी हकीकत भी इतनी ही खुशनुमा है?
मन में छुपा वो अनजाना खौफ
अगर समाज वाकई बदल चुका है और बेटियां सुरक्षित हैं, तो आज भी हमारे आसपास ऐसे कई सवाल हैं जो अनुत्तरित हैं:
- शाम का डर: आज भी सूरज ढलने के बाद घर लौटने में बेटियों के मन में घबराहट क्यों होती है?
- मदद मांगने की झिझक: किसी मुसीबत में फंसने पर वे किसी अनजान राहगीर से मदद मांगने में क्यों हिचकिचाती हैं?
- समारोहों में अविश्वास: किसी शादी या पार्टी में कुछ भी खाने-पीने से पहले उनके मन में असुरक्षा की भावना क्यों आती है?
- करियर और पढ़ाई में बाधा: ऑफिस की ट्रिप हो या स्कूल-कॉलेज का माहौल, कई जगहों पर बेटियां खुलकर अपनी बात रखने या जाने से क्यों कतराती हैं?
डर के साए में कटता दिन
सच तो यह है कि आज भी जब कोई बेटी काम या पढ़ाई के सिलसिले में घर से बाहर निकलती है, तो उसी पल से परिवार और उस बेटी के दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं। सुबह घर से निकलने से लेकर शाम को सकुशल वापस लौटने तक, पूरा दिन एक अजीब से तनाव और डर के साए में बीतता है।
मेरी कलम से (निष्कर्ष):
मैं पूछना चाहती हूँ कि क्या बेटियों को इस स्वतंत्र देश में आज भी आज़ादी से जीने का अधिकार नहीं है? क्या सुरक्षा के तमाम कानून सिर्फ किताबों की शोभा बढ़ाने के लिए हैं? अगर दावे सच हैं, तो यह डर झूठ क्यों नहीं लगता? इस गंभीर विषय पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि हमारी बेटियां आज सचमुच सुरक्षित हैं? अपने विचार नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

Bilkul ji adhikar hai 💯