स्वाभिमान (भाग-2): ₹10 की खातिर जब अपनों ने ही तोड़ दिया था दो मासूम बहनों का दिल!

नमस्ते दोस्तों! ‘हमारी दुनिया‘ में आप सभी का स्वागत है।

पिछले भाग में मैंने आपको बताया था कि कैसे मेरे पापा के सीधेपन और हमारे मध्यमवर्गीय होने की वजह से परिवार के कुछ लोग हमें अलग नजरिए से देखते थे। आज मैं आपको अपनी जिंदगी की उस सबसे दर्दनाक घटना के बारे में बताने जा रही हूँ, जिसने बचपन में ही मेरी और मेरी बहन ज्योति की आँखें पूरी तरह खोल दीं और हमें सिखाया कि असल में ‘अपने’ कौन होते हैं।

सज-धजकर निकली थीं दो बहनें, पर रास्ते में मिला दर्द

यह बात रक्षाबंधन के दिन की है। त्योहार का माहौल था, मैं और ज्योति बहुत खुश थे। हम दोनों बहनें अच्छे से तैयार हुईं, हाथों में पूजा और राखी की थाली सजाई और बड़े चाव से ताऊजी के बेटों को राखी बांधने के लिए उनके घर के बाहर पहुँचे। हम बस चौखट पार करने ही वाले थे कि अचानक अंदर से कुछ ऐसी बातें सुनाई दीं, जिसने हमारे मासूम दिलों को अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया।

अंदर हमारी ताईजी बोल रही थीं, “अब वो दोनों भी आने वाली होंगी… उन्हें भी पैसे देने पड़ेंगे, यह भी एक मुसीबत है!”

यह सुनकर हमारे कदम जहाँ के तहाँ थम गए। सच कहूँ तो वो हमें शगुन के तौर पर सिर्फ 10-20 रुपये देते थे, लेकिन हमारे लिए उन रुपयों की कोई कीमत नहीं थी, हम तो सिर्फ भाई के प्यार के लिए वहाँ गए थे। पर उस दिन अपनों के मुँह से खुद को ‘मुसीबत’ और ‘बोझ’ सुनकर हमारी हिम्मत नहीं हुई कि हम उस घर के अंदर कदम भी रख सकें। हम दोनों बहनें भरी आँखों से, बिना राखी बांधे, बाहर से ही चुपचाप रोते हुए घर वापस आ गईं।

माँ का वो दर्द और पापा का ऐतिहासिक फैसला

जब हम घर पहुँचे, तो मम्मी ने हमें उदास देखकर पूछा, “क्या हुआ बेटा?” हम कुछ बोल नहीं पाए, हमारी जुबान बंद थी। लेकिन मम्मी ने जब हमारी आँखों के आँसू और हाथों में सजी-सजाई राखी की थाली देखी, तो वो बिना कहे सब कुछ समझ गईं। उन्होंने बस इतना ही कहा, “कोई बात नहीं बच्चियों, अंदर चलो।”

मम्मी ने जब यह बात पापा और दादी को बताई, तो दादी को बहुत गुस्सा आया। उन्होंने हमें गले से लगाया और एक ऐसा आशीर्वाद दिया जिसने हमारी जिंदगी बदल दी। पापा ने हमें पास बिठाया और बहुत प्यार से समझाया, “बेटा, राखी भाई को इसलिए बांधी जाती है ताकि वो अपनी बहनों की रक्षा कर सके। अगर आज समाज के ठेकेदार रिश्तों को पैसों से तौल रहे हैं, तो तुम मुझे राखी बांधो। मैं अपनी आखिरी सांस तक तुम दोनों की रक्षा करूँगा।”

उस दिन से बदल गई हमारी दुनिया

पापा की यह बात सुनकर हमारी आँखों से आँसू बह निकले और हमने अपने पापा की कलाई पर राखी बांधना शुरू कर दिया। हमें ऐसा करते देख, हमारे दूसरे वाले ताऊजी (जिनके कोई बेटा नहीं था) उनकी बेटियों ने भी हमारे पापा को अपना भाई मानकर राखी बांधना शुरू कर दिया।

उस दिन के बाद से हमने कभी उन लोगों की तरफ मुड़कर नहीं देखा जिन्होंने हमारे आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाई थी। हम बहनें एक-दूसरे को भी राखी बांधने लगीं। उसी दिन हमें समझ आया कि रिश्तों की डोर पैसों से नहीं, बल्कि दिल के सम्मान से बंधी होती है।

दुआओं का असर: आज हमारी दुनिया में है हमारी ‘जान’

बचपन का वो जख्म बहुत गहरा था, लेकिन बड़ों का आशीर्वाद कभी खाली नहीं जाता। आज हमारी दादी, बुआ और नानाजी के आशीर्वाद और ईश्वर की कृपा से हमारे पास एक बहुत ही प्यारा छोटा भाई है—अभय। वो हम सभी बहनों की जान है, हमारा गुरूर है और हमारा स्वाभिमान है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो मुझे अपने पापा के उस फैसले पर गर्व होता है। भगवान से मेरी यही प्रार्थना है कि ‘हमारी दुनिया’ की हर बहन को एक ऐसा भाई और हर भाई को एक ऐसी बहन जरूर मिले, जो पैसों से ऊपर उठकर रिश्तों का सम्मान करना जानते हों।


आपकी क्या राय है?
क्या आपके जीवन में भी कभी किसी त्योहार पर अपनों के व्यवहार से आपका दिल टूटा है? और आपके जीवन में भाई-बहन के रिश्ते के क्या मायने हैं? कमेंट बॉक्स में अपने अनुभव और आशीर्वाद हमारे साथ जरूर शेयर करें!

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