हमारी दुनिया: जब स्वाभिमान ने सिखाया कि ‘अपने’ और ‘पराए’ में क्या फर्क होता है

नमस्कार दोस्तों! ‘हमारी दुनिया’ में आप सभी का स्वागत है।

आज मैं आपके साथ अपने जीवन की एक ऐसी सच्चाई और याद साझा करने जा रही हूँ, जिसने मुझे जिंदगी को एक नए नज़रिए से देखना सिखाया। आज भले ही हम चार बहनें और हमारा एक छोटा भाई हैं और हम सब बहुत खुश हैं, लेकिन एक दौर ऐसा भी था जब हमारी दुनिया में सिर्फ हम तीन बहनें ही थीं।

बचपन की वो मासूम समझ

शुरुआत में हम तीन बहनें थीं—सबसे बड़ी दीदी वंदना, फिर मैं मनीषा, और हमारी छोटी बहन ज्योति। उस वक्त हमारा कोई सगा भाई नहीं था। सच कहूँ तो हमारे मम्मी, पापा, दादी और बुआ ने हमें कभी इस बात का अहसास ही नहीं होने दिया कि हम लड़कियाँ हैं या हमें किसी भाई की कमी है। उन्होंने हमें हमेशा बेटों की तरह पाला।

हमारे परिवार में पापा के चार बड़े भाई (चार ताऊजी) थे। उनके बेटे भी थे, जिन्हें हम बचपन से ही अपना सगा भाई मानते थे। हमारे मन में उनके लिए कोई परायापन नहीं था। लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े हुए और दुनिया की समझ आने लगी, तब हमें एक कड़वा सच मालूम हुआ। हमें अहसास हुआ कि सिर्फ हम ही उन्हें अपना भाई मानते थे, जबकि वो और उनका परिवार हमें सिर्फ किसी तरह ‘बर्दाश्त’ कर रहे थे। दीदी बड़ी थीं, तो उन्हें यह बात जल्दी समझ आ गई, लेकिन मुझे इसे समझने में थोड़ा वक्त लगा।

सादगी बनाम समाज की ताकत

हमारे और दूसरे नंबर के ताऊजी, दोनों के ही घरों में कोई बेटा नहीं था, सिर्फ बेटियाँ थीं। ताऊजी की दो बेटियाँ और हम तीन बहनें। लेकिन बाकी ताऊजी और उनका परिवार, दूसरे नंबर के ताऊजी की बेटियों को बहुत ज़्यादा मान-सम्मान देते थे। वजह सिर्फ इतनी थी कि वो ताऊजी थोड़े रसूखदार और पावरफुल (ताकतवर) थे।

इसके विपरीत, मेरे पापा सबसे छोटे थे। वे स्वभाव से बेहद सीधे-साधे और सच्चे इंसान थे। उस दौर में हमारे पास ज़्यादा पैसे भी नहीं थे। लेकिन मेरे मम्मी-पापा पढ़े-लिखे थे। उन्होंने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। वे अपनी मेहनत के दम पर पाई-पाई जोड़कर हम तीनों बहनों को पढ़ा रहे थे। वे किसी से मदद नहीं मांगते थे, अपनी लड़ाई खुद लड़ते थे।

झुकना मंजूर नहीं था

परिवार के बाकी लोगों को हमारा यह स्वाभिमान पसंद नहीं आता था। वे चाहते थे कि मेरे मम्मी-पापा और हम तीनों बहनें हमेशा उनके सामने झुककर रहें, उनकी जी-हुज़ूरी करें। लेकिन मेरे मम्मी-पापा को किसी के सामने झुककर ज़िंदगी गुज़ारना कभी मंज़ूर नहीं था। उन्होंने हमें सिखाया कि गरीबी में भी सिर उठाकर कैसे जिया जाता है।

तभी तो एक दिन हमारी ज़िंदगी में एक ऐसी घटना घटी, जिसने मेरी आँखें पूरी तरह खोल दीं और मुझे समझा दिया कि असल में ‘अपने’ कौन होते हैं और ‘पराए’ कौन…


5 thoughts on “हमारी दुनिया: जब स्वाभिमान ने सिखाया कि ‘अपने’ और ‘पराए’ में क्या फर्क होता है”

  1. POOJA CHAUDHARY

    वाकई! वक्त बदलते ही रिश्तों के मुखौटे उतर जाते हैं। बहुत ही शानदार और प्रेरणादायक कहानी लिखी है आपने। हमारी दुनिया की हर कहानी लाजवाब होती है। ❤️

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