मम्मी-पापा की जीवन यात्रा – हमारे अनकहे हीरो (भाग 4)

नमस्कार दोस्तों! आप सभी का स्वागत है हमारी दुनिया ‘मम्मी पापा की जीवन यात्रा – हमारे अनकहे हीरो (भाग 4)’ में।

कल भाग 3 में मैंने आपको बताया था कि पिलखुवा के मशहूर ‘राणा डिग्री कॉलेज’ के कैंपस में मेरी मम्मी और पापा की पहली मुलाक़ात हुई थी। लेकिन दोस्तों, आज इस भाग में हम उस कहानी के थोड़े और अंदर चलेंगे और जानेंगे कि उस दौर का कॉलेज का प्यार कैसा होता था, क्योंकि आज की तरह उस समय मोबाइल या सोशल मीडिया तो थे नहीं।

इस कहानी की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि मम्मी और पापा एक ही कॉलेज में तो थे, लेकिन दोनों की क्लास अलग-अलग थीं। अब आप खुद सोचिए, जब क्लास अलग हो, तो एक-दूसरे की बस एक झलक पाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती होगी! आज की तरह तो था नहीं कि क्लास में साथ बैठे हैं या फोन पर मैसेज कर दिया। उस दौर में तो सिर्फ यह इंतजार रहता था कि कब कॉलेज की घंटी बजेगी, कब ब्रेक (आधी छुट्टी) होगी और कब एक-दूसरे को देखने का मौका मिलेगा।

रोज़ कॉलेज आना, अपनी क्लास से निकलकर कॉलेज के ग्राउंड, गैलरी या सीढ़ियों के पास से गुज़रना और बस इसी उम्मीद में रहना कि कहीं न कहीं वो सामने से आते हुए दिख जाएं। जब दोनों का आमना-सामना होता था, तो बिना कुछ बोले अचानक नज़रें झुका लेना—यही उस दौर की सबसे हसीन शुरुआत हुआ करती थी। अलग क्लास होने के बावजूद दोनों को एक-दूसरे की मौजूदगी का गहरा अहसास होने लगा था।

शुरुआत में दोनों के बीच बातचीत का सिर्फ़ एक ही ज़रिया था, और वो था ‘कॉलेज के नोट्स या लाइब्रेरी की किताबें’। अपनी क्लास के काम के बहाने या किसी दोस्त की मदद से नोट्स का लेन-देन शुरू हुआ। इसी बहाने से पहली बार दोनों के बीच बात करने का मौका मिला। जब पहली बार बात हुई होगी, तो सोचिए दोनों के दिलों की धड़कनें कितनी तेज़ रही होंगी! वो नोट्स और किताबें सिर्फ़ पढ़ाई का जरिया नहीं थे, बल्कि वे दो अलग-अलग क्लासेस में पढ़ने वाले दिलों को जोड़ने वाले अनकहे ख़त थे।

उस दौर के प्यार में एक बहुत बड़ा ठहराव और इज़्ज़त हुआ करती थी। मम्मी-पापा की इस कहानी में भी पहले सिर्फ़ एक गहरी दोस्ती हुई। जहाँ एक तरफ पापा का स्वाभिमानी और थोड़ा कड़क मिज़ाज था, वहीं मम्मी की असीम सादगी और समझदार स्वभाव पापा के दिल को छू गया था। कॉलेज की छुट्टी के बाद कुछ पल के लिए गेट के पास रुकना, बस एक-दूसरे को मुस्कुराकर अलविदा कहना ही उनके पूरे दिन की सबसे बड़ी ख़ुशी बन गया था।

राणा डिग्री कॉलेज की वो सीढ़ियाँ, वो ग्राउंड और वो गलियारे इस बात के गवाह थे कि दो अलग क्लासेस में बैठने के बाद भी, हमारी दुनिया की सबसे कामयाब और सुपरहिट लव स्टोरी ने अपने पंख फैला लिए थे।

ओके दोस्तों! आज हमारी दुनिया में हमने मम्मी-पापा के कॉलेज के दिनों की उस मीठी शुरुआत और अलग क्लास होने के बावजूद उस शुरुआती प्यार के अहसास को करीब से जाना है। अगली पोस्ट (भाग 5) में हम जानेंगे कि जब यह बात थोड़ी आगे बढ़ी, तो दोनों ने एक-दूसरे से अपने दिल की बात कैसे कही (उनका इक़रार कैसा था) और कॉलेज के बाकी दोस्तों को इसके बारे में कैसे भनक लगी।

कल फिर मिलेंगे एक नए और बेहद दिलचस्प भाग के साथ! तब तक के लिए आप सभी को प्यार भरा राधे-राधे जी! 🙏✨🏫❤️

8 thoughts on “मम्मी-पापा की जीवन यात्रा – हमारे अनकहे हीरो (भाग 4)”

  1. POOJA CHAUDHARY

    “वाह! उस दौर के प्यार की बात ही कुछ और थी। बिना मोबाइल के सिर्फ एक झलक पाने का वो इंतज़ार और वो सादगी भरा अहसास… आपने बहुत ही सुंदर तरीके से शब्दों में पिरोया है। अब भाग 5 का बेसब्री से इंतज़ार है कि आगे क्या हुआ! 🏫❤️✨”

  2. जीवन की इस खूबसूरत यात्रा के लिए आप दोनों को बहुत-बहुत बधाई। आपकी मुस्कान हमेशा बनी रहे!

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